हनुमान गढ़ी, अयोध्या: भगवान हनुमान का दुर्ग-मन्दिर
अयोध्या के हनुमान गढ़ी का सम्पूर्ण परिचय: भगवान हनुमान का प्रसिद्ध दुर्गाकार मन्दिर, 76 सीढ़ियाँ, अञ्जनी माता की गोद में शिशु हनुमान की दुर्लभ मूर्ति, अवध के नवाब द्वारा निर्मित 18वीं शताब्दी का इतिहास, और दर्शन-सूचना।
हनुमान गढ़ी अयोध्या के सर्वाधिक दर्शित तीर्थ-स्थलों में है। परम्परा के अनुसार, राम जन्मभूमि के दर्शन से पूर्व सेवक हनुमान को प्रणाम करना प्रत्येक तीर्थयात्री का कर्तव्य है। अधिकांश श्रद्धालु हनुमान गढ़ी के दर्शन पहले और राम मन्दिर के दर्शन बाद में उसी दिन करते हैं।
वास्तुकला
मन्दिर अयोध्या की पुरानी बस्ती के मध्य एक ऊँचे टीले पर चतुर्भुज दुर्ग के रूप में निर्मित है। सड़क से गर्भगृह तक 76 पत्थर की सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं: वृद्ध तीर्थयात्रियों के लिए कठिन किन्तु ऊपरी चबूतरे से अयोध्या का विहंगम दृश्य देखने योग्य।
मन्दिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में अवध के एक नवाब ने करवाया था, जो एक मुस्लिम शासक द्वारा हिन्दू मन्दिर के निर्माण का विलक्षण उदाहरण है। शिलालेख एवं गज़ेटियर के अभिलेख इस स्थल पर निवासी एक सन्त के चमत्कार के पश्चात् अवध-दरबार के संरक्षण की पुष्टि करते हैं।
देवमूर्ति
गर्भगृह की मुख्य मूर्ति विलक्षण है: यह अञ्जनी माता को दर्शाती है जो अपनी गोद में शिशु हनुमान को लिए बैठी हैं। यह बाल-हनुमान प्रतिमा उत्तर भारत में अत्यन्त दुर्लभ है और हनुमान गढ़ी को एक विशिष्ट भक्ति-चरित्र प्रदान करती है। भक्त मूर्ति के समक्ष गेंदे की माला, सिन्दूर और बूँदी के लड्डू अर्पित करते हैं।
मंगलवार और शनिवार को, जो परम्परागत रूप से हनुमान-पूजा के लिए शुभ माने जाते हैं, वातावरण विशेष रूप से भाव-भीना होता है। दुर्ग में हनुमान चालीसा का निरन्तर पाठ गूँजता रहता है।
दर्शन
- समय: प्रतिदिन लगभग प्रातः 4:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक; पर्वों पर अधिक समय।
- हनुमान जयन्ती (मार्च-अप्रैल) विशेष उल्लास के साथ मनाई जाती है; अत्यधिक भीड़ की अपेक्षा रखें।
- 76 सीढ़ियों के दोनों ओर रेलिंग है; स्वयंसेवक वृद्ध एवं दिव्यांग तीर्थयात्रियों की सहायता करते हैं।
- मन्दिर पुरानी अयोध्या के हृदय-स्थल में है, कनक भवन, रामकोट, तथा प्रसाद-विक्रेताओं से भरी बाज़ार-गलियों से पैदल दूरी पर।
समीपवर्ती स्थल
रामकोट · कनक भवन · नागेश्वरनाथ · सरयू
स्रोत एवं सन्दर्भ
- फैज़ाबाद ज़िला गज़ेटियर
- अयोध्या माहात्म्य, स्कन्द पुराण