राम जन्मभूमि: सम्पूर्ण कालक्रम एवं इतिहास
अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि का तथ्यपरक एवं सन्दर्भ-सहित कालक्रम: भगवान श्रीराम के पौराणिक जन्म से, 1528 के बाबरी ढाँचे, वैधानिक विवादों, 1992 के विध्वंस, 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, तथा 2024 की प्राण प्रतिष्ठा तक।
अयोध्या के वर्तमान राम जन्मभूमि मन्दिर के निर्माण की भूमिका तैयार करने वाली घटनाओं का तथ्यपरक कालक्रम: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्टों, लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट, तथा भारत सरकार के विज्ञप्ति-वक्तव्यों पर आधारित। जहाँ तिथि ऐतिहासिक के स्थान पर पौराणिक या पारम्परिक है, वह स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है।
प्राचीन एवं पारम्परिक काल
- त्रेता युग (पौराणिक): वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम का जन्म इसी स्थान पर राजा दशरथ एवं रानी कौशल्या के यहाँ हुआ। यह स्थान राम जन्मभूमि: “राम का जन्मस्थान”: कहलाता है।
- पहली शताब्दी ई.पू. (पारम्परिक): परम्परा के अनुसार उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने लुप्त नगरी अयोध्या को पुनः खोजा और जन्मभूमि पर मन्दिर का पुनर्निर्माण कराया।
- उत्तर प्राचीन एवं मध्यकाल: स्थानीय अनुश्रुतियों एवं समानान्तर जैन/बौद्ध परम्पराओं के अनुसार इस स्थान पर अनेक बार मन्दिरों का निर्माण-पुनर्निर्माण होता रहा।
मुग़ल काल
- 1528 ईस्वी: मुग़ल सम्राट बाबर के शासनकाल में, उसके सेनापति मीर बाक़ी द्वारा मस्जिदनुमा एक संरचना का निर्माण कराया गया, जो आगे चलकर बाबरी ढाँचा के नाम से जानी गई। हिन्दू परम्परा के अनुसार राम जन्मभूमि पर पूर्व-विद्यमान मन्दिर को ध्वस्त करके यह संरचना बनाई गई थी; भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के 2003 के उत्खनन ने इस पूर्व-विद्यमान विशाल संरचना के अस्तित्व की पुष्टि की।
ब्रिटिश राज: प्रथम मुक़दमे
- 1853–1858: अवध के ब्रिटिश प्रशासन के अधीन विवादित स्थल पर प्रथम अभिलिखित साम्प्रदायिक घटनाएँ।
- 1885: महंत रघुबर दास ने विवादित स्थल के बाहरी प्रांगण में चबूतरा निर्माण की अनुमति माँगते हुए प्रथम औपचारिक वाद दायर किया। यह वाद ख़ारिज कर दिया गया।
स्वतन्त्रता-पश्चात् काल
- 22–23 दिसम्बर 1949: विवादित ढाँचे के मुख्य गुम्बद के भीतर राम लला की मूर्तियाँ प्रकट हुईं: ऐसा कहा जाता है। साम्प्रदायिक तनाव से बचने हेतु ज़िला प्रशासन ने स्थल को बन्द कर दिया; अगले एक वर्ष में हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों पक्षों ने सिविल वाद दायर किए।
- 1950: गोपाल सिंह विशारद ने स्थल पर पूजा का अधिकार माँगते हुए वाद दायर किया। परमहंस रामचन्द्र दास ने एक और वाद दायर किया। इसके पश्चात् निर्मोही अखाड़ा (1959) तथा सुन्नी केन्द्रीय वक़्फ़ बोर्ड (1961) के वाद आए।
- 1 फरवरी 1986: ज़िला न्यायालय ने विवादित ढाँचे के द्वार खोलने का आदेश दिया, जिससे राम लला की मूर्तियों की हिन्दू पूजा प्रारम्भ हुई।
- 9 नवम्बर 1989: विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा विवादित स्थल के समीप शिलान्यास सम्पन्न किया गया।
1992 का विध्वंस एवं उसके बाद
- 6 दिसम्बर 1992: बाबरी ढाँचा ध्वस्त किया गया एक विशाल जनसमूह द्वारा। इसके पश्चात् कई भारतीय शहरों में साम्प्रदायिक हिंसा हुई। अगले माह भारत सरकार ने लिब्रहान आयोग की जाँच गठित की।
- 1993: संसद ने अयोध्या में निश्चित क्षेत्र अधिग्रहण अधिनियम पारित किया; विवादित एवं आसपास की लगभग 67 एकड़ भूमि केन्द्र सरकार द्वारा अधिगृहीत की गई।
- 2003: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उत्खनन किया। उसकी रिपोर्ट ने ध्वस्त मस्जिद के नीचे विशाल पूर्व-विद्यमान संरचना के साक्ष्य का निष्कर्ष दिया।
वैधानिक समाधान
- 30 सितम्बर 2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशीय पीठ ने 2:1 बहुमत से निर्णय देते हुए 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा, तथा रामलला विराजमान का प्रतिनिधित्व करने वाले हिन्दू वादीगण के बीच तीन समान भागों में विभाजित कर दिया। सभी पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की।
- 9 नवम्बर 2019: भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पाँच-न्यायाधीशीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय देते हुए सम्पूर्ण 2.77 एकड़ विवादित भूमि राम लला विराजमान को राम मन्दिर निर्माण हेतु प्रदान की, और भारत सरकार को सुन्नी केन्द्रीय वक़्फ़ बोर्ड को अयोध्या में किसी प्रमुख स्थान पर 5 एकड़ वैकल्पिक भूमि आवंटित करने का निर्देश दिया।
नवीन मन्दिर का निर्माण
- 5 फरवरी 2020: निर्माण एवं प्रबन्धन की देखरेख हेतु भारत सरकार द्वारा श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया गया।
- 5 अगस्त 2020: प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भूमि पूजन (शिलान्यास संस्कार) सम्पन्न किया गया, जो निर्माण के औपचारिक प्रारम्भ का प्रतीक रहा।
- सितम्बर 2020 – दिसम्बर 2023: चरणबद्ध रूप से निर्माण आगे बढ़ा। अहमदाबाद का सोमपुरा परिवार मुख्य स्थापत्यकार रहा; मन्दिर का निर्माण नागर शैली में बंशी पहाड़पुर बलुआ पत्थर से किया गया, जिसमें संरचनात्मक डिज़ाइन में लोहे का प्रयोग नहीं किया गया।
- 22 जनवरी 2024: प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई; मैसूर के अरुण योगिराज द्वारा निर्मित राम लला विराजमान की मूर्ति गर्भगृह में स्थापित की गई। तत्पश्चात् सार्वजनिक दर्शन प्रारम्भ हुए।
सम्पूर्ण परिसर का पूर्ण होना
- 5 जून 2025: राम दरबार एवं छह परकोटा मन्दिरों: सूर्य देव, भगवती, गणेश, शिव, हनुमान एवं अन्नपूर्णा को समर्पित: का संयुक्त पूजन किया गया; जनसामान्य के लिए दर्शन हेतु खोला गया।
- 25 नवम्बर 2025: ध्वजारोहण: प्रधानमन्त्री द्वारा मुख्य शिखर पर औपचारिक भगवा ध्वज का आरोहण किया गया, जिसने सात ऋषि मण्डपों सहित सम्पूर्ण मन्दिर परिसर के औपचारिक रूप से पूर्ण होने को चिह्नित किया। सम्पूर्ण परियोजना लागत: लगभग ₹1,900 करोड़।
स्रोत एवं सन्दर्भ
- भारत का सर्वोच्च न्यायालय: एम. सिद्दीक बनाम महंत सुरेश दास, निर्णय दिनांक 9 नवम्बर 2019
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय: स्वत्व-वाद का निर्णय, 30 सितम्बर 2010
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण: अयोध्या पर उत्खनन रिपोर्ट, 2003
- लिब्रहान आयोग जाँच: अन्तिम रिपोर्ट, 30 जून 2009
- अयोध्या में निश्चित क्षेत्र अधिग्रहण अधिनियम, 1993
- प्रेस सूचना ब्यूरो, भारत सरकार: जनवरी 2024